जिन लोगों का उधार हमारे ऊपर था, उसे चुकाने के लिए हमने अपना घर तक बेच दिया। उस समय बस यही सोचा कि किसी का हक़ हमारे ऊपर नहीं रहना चाहिए।
आज जब हमें अपने ही पैसे की जरूरत पड़ी, तो परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बनीं कि हमें भी इंतज़ार और मजबूरियों को समझना पड़ा।
शिकायत पैसों से नहीं है… बस दिल में एक बात रह गई है कि **हमने उनकी जरूरत के समय अपनी मजबूरी नहीं देखी, काश हमारी जरूरत के समय हमारी मजबूरी भी थोड़ी समझ ली जाती।**
शायद जिंदगी इसी तरह इंसान और रिश्तों की असली अहमियत समझाती है।